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नौकरी के दौरान दिव्यांग होने पर कर्मचारी को दूसरा काम देना नियोक्ता की ज़िम्मेदारी: सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (1 अगस्त) को यह दोहराया कि यदि कोई कर्मचारी सेवा के दौरान दिव्यांगता का शिकार हो जाता है, तो नियोक्ता की यह संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारी है कि वह उसे उपयुक्त वैकल्पिक पद प्रदान करे, जब तक कि संगठन में ऐसा कोई पद मौजूद न हो। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अरविंद कुमार की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (APSRTC) के एक बस चालक को राहत प्रदान की, जिसे सेवा के दौरान रंग-अंधता (Colour Blindness) विकसित हो जाने के कारण बिना किसी वैकल्पिक पद की पेशकश के समय से पहले सेवा से हटा दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल में कुलपतियों की नियुक्ति के संबंध में अपने पिछले निर्देशों में संशोधन करते हुए पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) यूयू ललित और उनकी अध्यक्षता वाली चयन समिति को 15 विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवारों का स्वतंत्र रूप से चयन करने की ज़िम्मेदारी सौंपी।

न्यायालय ने कहा, 
"जस्टिस ललित और उनकी चयन समिति के सदस्य इस मुद्दे को सुलझाने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं, क्योंकि उन्होंने न केवल उम्मीदवारों से बातचीत की है, बल्कि उनकी उम्मीदवारी पर विचार करते समय उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों, अनुभव, योग्यता और अन्य प्रासंगिक कारकों की भी जाँच की है।"

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ पश्चिम बंगाल सरकार और राज्यपाल सीवी आनंद बोस, जो राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं, उनके बीच विवाद की सुनवाई कर रही थी। न्यायालय ने दोनों संवैधानिक प्राधिकारियों के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए जुलाई 2024 में जस्टिस ललित के नेतृत्व में समिति का गठन किया था। समिति द्वारा की गई सिफारिशों और निर्णय में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए 35 में से 17 राज्य विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति पहले ही की जा चुकी है। इन चयनों को कुलाधिपति द्वारा विधिवत अनुमोदित किया गया।


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