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महिला दिवस विशेष वो माएं, जो घर के साथ मेट्रो चलाती हैं:जयपुर का पहला महिला मेट्रो स्टेशन, सुपरिटेंडेंट बोलीं- लोग कहते थे, बच्चे-बच्चियां कैसे संभालेंगी Reporting:- by = Aryan Sharma


 गुरुवार सात मार्च दोपहर के लगभग 3.30 बजे, जयपुर के श्याम नगर मेट्रो स्टेशन पर अच्छी खासी हलचल थी। प्लेटफार्म पर यात्री अपनी मंजिल की ओर बढ़ने के लिए तैयार थे।

हम भी वहीं खड़े थे, अचानक सामने से मेट्रो ट्रेन आती दिखी। नीले और सफेद रंग की वो आधुनिक ट्रेन, जो रोजाना हजारों यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती है, आज हमें एक खास कहानी सुनाने वाली थी।

गाड़ी धीमी हुई, प्लेटफार्म पर रुकी। दरवाजे खुले और यात्री उतरने लगे। हमारी नजरें इंजन के उस कांच की केबिन पर थीं, एक महिला वर्दी पहने पूरे आत्मविश्वास के साथ प्लेटफार्म से केबिन की ओर बढ़ी।

आत्मविश्वास से लबरेज महिला ने गेट खोला और ट्रेन की कमान अपने हाथों में ली। ये झुंझुनूं की मीना सोनी हैं, जो पिछले 10 साल से पिंक सिटी मेट्रो की लोको पायलट हैं। उनकी तरह इस पूरे मेट्रो स्टेशन की कमान महिलाओं के हाथ में ही है।

आज महिला दिवस मेट्रो संभालने वाली महिलाओं के जज्बे की कहानी बताते हैं…. 

झुंझुनूं से जयपुर मेट्रो तक का सफर

मीना सोनी का सफर चुनौतियों से भरा रहा है। एक ऐसे परिवार से आने के बावजूद, जहां लड़कियों की उच्च शिक्षा को अधिक महत्व नहीं दिया जाता था, उन्होंने अपने पिता के समर्थन से अपनी पढ़ाई पूरी की।

झुंझुनूं में बीएससी करने के बाद उन्होंने जयपुर आकर राजस्थान विश्वविद्यालय से एमएससी (गणित) की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की।

2013 में, जब जयपुर में मेट्रो निर्माण कार्य जोरों पर था, उन्होंने मेट्रो में करियर बनाने का निर्णय लिया। स्टेशन कंट्रोलर-कम-ट्रेन ऑपरेटर की परीक्षा पास कर मेट्रो सर्विसेज को जॉइन किया।

छह महीने की ट्रेनिंग दिल्ली मेट्रो से मिली। मीना ने बताया कि उस समय लड़कियों के लिए सबसे बेस्ट जॉब एजुकेशन सेक्टर को माना जाता था। लेकिन जैसी ही मैंने बताया कि मेट्रो चलाने की जॉब लगी है, एक बार को तो रिश्तेदार भी चौंक गए। 

3 जून 2015 को जब उन्होंने पहली बार मेट्रो चलाई, तो परिवार के मन में घबराहट भी थी और उत्साह भी। लेकिन यह पल उनके लिए गर्व का था क्योंकि यह साबित करने का मौका था कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं।

दो साल के बच्चे को घर छोड़कर आना बहुत मुश्किल

आज, दो साल के बेटे की मां होने के बावजूद, मीना नौकरी और परिवार दोनों को कुशलता से संभाल रही हैं। मीना बताती हैं कि बच्चा बहुत छोटा है हमेशा दिमाग में उसी का ख्याल रहता है। मैटरनिटी लीव के बाद जब दोबारा काम पर आई थी तो 6 महीने के बच्चे की चिंता हर समय लगी रहती थी। 

लेकिन मुझे पता है जैसे मेरे बच्चे की जिम्मेदारी मुझ पर है वैसे ही मेट्रो में बैठा हर पैसेंजर भी मेरी ही जिम्मेदारी है। अब बच्चा दो साल का हो चुका है जैसे ही घर जाती वही गेट खोलता है और मुझसे लिपट जाता है।

लेकिन पति और ससुरालवालों की मदद से चीजें काफी आसान हो गई है। मीना कहती हैं- हर दिन नई चुनौती होती है, लेकिन हिम्मत और परिवार के सहयोग से सब कुछ संभव हो जाता है।

स्टेशन पर दूसरी मुलाकात: सुपरिटेंडेंट योगिता से

मेट्रो स्टेशन के कंट्रोल रूम की ओर हमारी नजर गई। वहां एक और महिला अपने स्टाफ को निर्देश दे रही थीं, मॉनिटर पर नजर बनाए हुए थीं, और स्टेशन की व्यवस्थाओं को संभाल रही थीं। 



योगिता कहती हैं- एक औरत को परिवार, बच्चे और करियर तीनों में बैलेंस बनाना आना चाहिए क्योंकि ये तीनों ही महिला के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। मेरे दो बच्चे हैं, एक तीन साल का बेटा है और एक नौ साल की बेटी है। कई बार लगता है बच्चों को थोड़ा कम समय दे पाती हूं, पर ऐसा संभव नहीं है।

परिवार का पूरा सपोर्ट है, यही कारण है कि अपने दो बच्चों की परवरिश के साथ ही हजारों यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी बखूबी निभा पा रही हूं। जब पहली बार मेट्रो कंट्रोल हाथ में आया, तो डर था कि कैसे संभालूंगी। लेकिन जब यहां तक आई हूं, तो आगे भी जाऊंगी।

पहला ‘महिला शक्ति' मेट्रो स्टेशन

जयपुर का श्याम नगर मेट्रो स्टेशन पहला 'महिला शक्ति' मेट्रो स्टेशन है, जहां पूरा स्टाफ महिलाओं का है। चाहे टिकट विंडो पर टिकट जारी करना हो, कंट्रोलर की जिम्मेदारी निभाना हो, ट्रेन ऑपरेट करना हो या फिर सफाई और सुरक्षा का काम देखना हो, यहां हर भूमिका महिलाएं संभालती हैं।

इस स्टेशन पर 30 से अधिक महिलाएं अलग-अलग शिफ्टों में कार्यरत हैं। 14 सितंबर 2015 को इसे देश का पहला 'महिला मेट्रो स्टेशन' घोषित किया गया था। 




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